मातृभूमि की रक्षा तथा अगाध प्रेम और दान वीरता के लिए भामाशाह का नाम इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। 28 जून 1542 को राजस्थान के मेवाड़ में दान वीर कर्ण के दूसरे अवतार के रूप में भामा शाह का जन्म हुआ । वे बाल्यकाल से ही मेवाड़ के राजा राणा प्रताप के मित्र सहयोगी तथा विश्वासपात्र एवं योग्य सलाहकार थे। दानवीर भामाशाह का मातृभूमि के लिए त्याग तपस्या तथा समर्पण निश्चित रूप से अविरल है। ना भूतो ना भविष्यति अर्थात इतिहास में आज तक कोई भी ऐसा दानवीर नहीं मिला जिसने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व समर्पण किया हो। ज्ञातव्य हो कि जब मुगल शासन से परेशान होकर की मेवाड़ की राजा राणा प्रताप सिंह हल्दीघाटी के युद्ध में पराजित हो गए तब वनों में और पहाड़ों में छुपते छुपाते किसी भी प्रकार से मान सम्मान को बचाने के लिए मेवाड़ के राजा देश छोड़ने के लिए विवश हो रहे थे ।इस विपरीत परिस्थिति में दानवीर भामाशाह ने 25000 सैनिकों के लिए 12 वर्ष तक के राशन और भोजन की व्यवस्था किया तब इस दान से उत्साहित होकर राणा प्रताप ने मेवाड़ का राज्य जीतलिया । 52 वर्ष की अल्प आयु में ही दानवीर भामाशाह ने इस मातृभूमि को अंतिम सलामी दिया आज संपूर्ण वैश्य समाज भामाशाह के त्याग से बहुत ही प्रफुल्लित एवं गौरवान्वित है निश्चित रूप से भामाशाह ने समग्र वैश्य समाज को एक नई दिशा दिया और समाज की दशा को बदलने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाया ।आज का यह दिन हम सभी को भामा शाह के जीवन से शिक्षा लेना चाहिए कि मातृ भूमि के आन बान और शान तथा मान सम्मान और स्वाभिमान से कभी भी समझौता नही करना चाहिए बल्कि अपना सर्वस्व न्यौछावर करके भी बचाना चाहिए।आज भी वैश्य समाज सर्व समाज ही नही बल्कि सभी सरकारों का भी पोषक है ।सम्पूर्ण भारत के 90प्रतिशत कुआं पोखरा विद्यालय अस्पताल अनाथालय धर्मशाला मंदिर तथा परमार्थ के कार्य वैश्य समाज के अनुदानों से चलता है । आइए आज के शुभ दिन पर हम संकल्प ले कि हम सभी भामा शाह के चरित्रों को जीवन में उतारें और एक निर्मल अविरल तथा स्वच्छ और स्वस्थ समाज की संरचना करें । डा रामगोपाल गुप्त
जिलाध्यक्ष
अखिल भारतीय वैश्य सभा मऊ
भामा शाह जयंती पर विशेष
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