अस्ताचलगामी भगवान सूर्य को व्रती महिलाओं ने दिया पहला अर्घ

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ब्यूरो रिपोर्ट:जय प्रकाश श्रीवास्तव

बोगरिया/गंभीरपुर /आजमगढ़।आस्था का महापर्व चार दिवसीय डाला छठ मे व्रती महिलाओं ने रविवार की शाम को डूबते हुए सूर्य को पहला अर्घ दिया। रविवार की सुबह ही व्रती महिलाएं अपने-अपने घरों में पूजन अर्चन की तैयारी शुरू कर दी थी शाम लगभग 3:00 बजते ही महिलाएं घर से कुछ दुरी पर जलाशय में आकर घाट के किनारे बैठकर पूजन अर्चन करने लगी और दिन डूबते ही भगवान सूर्य का पहला अर्घ दिया। पौहारी बाबा मंदिर मंडियां बोगरिया, काली माता मंदिर पोखरा पट्टी, प्राचीन शिव मंदिर रासेपुर बाबा विश्वनाथ दास मंदिर, प्राचीन शिव मंदिर गंभीरपुर, राम जानकी मंदिर बिंद्रा बाजार,बिषया, बसीरहा, बेलऊ,कलंदरपुर, उत्तरगांवा, दयालपुर, मुहम्मदपुर, रीवा समेत अनेक गावों मे प्रति महिलाओं ने पूजन अर्चन किया। व्रती महिलाये डूबते हुए सूर्य को अर्घ देकर एक संदेश देती है कि हमें डूबते हुए सूर्य का कभी भी तिरस्कार नहीं करना चाहिए।पंडित राजेंद्र मिश्रा ने बताया की छठ पूजा का महत्व बहुत ज्यादा है। यह व्रत सूर्य भगवान, उषा, प्रकृति, जल, वायु आदि को समर्पित है। इस त्यौहार को मुख्यत: बिहार में मनाया जाता है।लेकिन अब पुरे भारत मे इस व्रत को मनाया जाता है।इस व्रत को करने से नि:संतान दंपत्तियों को संतान सुख प्राप्त होता है। कहा जाता है कि यह व्रत संतान की रक्षा और उनके जीवन की खुशहाली के लिए किया जाता है। इस व्रत का फल सैकड़ों यज्ञों के फल की प्राप्ति से भी ज्यादा होता है। सिर्फ संतान ही नहीं बल्कि परिवार में सुख समृद्धि की प्राप्ति के लिए भी यह व्रत किया जाता है।पौराणिक कथा के अनुसार, एक राजा था जिसका नाम प्रियंवद था। राजा की कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए राजा ने यज्ञ करवाया। यह यज्ञ महर्षि कश्यप ने संपन्न कराया और यज्ञ करने के बाद महर्षि ने प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर प्रसाद के रुप में ग्रहण करने के लिए दी। यह खीर खाने से उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई लेकिन उनका पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। यह देख राजा बेहद व्याकुल और दुखी हो गए। राजा प्रियंवद अपने मरे हुए पुत्र को लेकर शमशान गए और पुत्र वियोग में अपने प्राण त्यागने लगे।
इस समय ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं। देवसेना ने राजा से कहा कि वो उनकी पूजा करें। ये देवी सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं। यही कारण है कि ये छठी मईया कही जाती हैं। जैसा माता ने कहा था ठीक वैसे ही राजा ने पुत्र इच्छा की कामना से देवी षष्ठी का व्रत किया। यह व्रत करने से राजा प्रियंवद को पुत्र की प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि छठ पूजा संतान प्राप्ति और संतान के सुखी जीवन के लिए किया जाता है।

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