राम राज्य को स्थापित करने के लिए श्री राम को जानना होगा -साध्वी अनंता भारती।

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मेंहनगर (आजमगढ़)।

गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी के दिव्य मार्गदर्शन में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा 29 जनवरी से 2 फरवरी तक मेहनगर लखराव पोखरा प्रांगण में भव्य श्री हरि कथा का भव्य आयोजन किया गया। कथा के अंतिम दिवस में साध्वी अनंता जी ने रामराज्य प्रसंग का रहस्यों उद्घाटन किया।
उन्होंने बताया कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के मार्गदर्शन में अयोध्या का राज्य सभी प्रकार से उन्नत था। क्या यही राम राज्य की वास्तविक परिभाषा है तो इसका जवाब है नहीं। अगर यही रामराज्य की सही परिभाषा है तो लंका भी तो भौतिक सम्पन्नता, समृद्धि, ऐश्वर्य, सुव्यवस्थित सेना में अग्रणी थी। परन्तु फिर भी उसे राम राज्य के समतुल्य नहीं कहा जाता क्योंकि लंकावासी मानसिक स्तर पर पूर्णता अविकसित थे। उनके भीतर आसुरी प्रवृत्तियों का बोलवाला था। वहाँ की वायु तक में भी अनीति, अनाचार और पाप की दुर्गन्ध थी। जहाँ चारों और भ्रष्टाचार और चरित्रहीनता का ही सम्राज्य फैला हुआ था।
राम के राज्य की बात सुनते ही अक्सर मनमें विचार आते हैं। कि राम राज्य आज भी होना चाहिये। स्वामी जी ने कहा कि वर्तमान समय में भी यदि हम ऐसे ही अलौकिक राम राज्य की स्थापना करना चाहतें हैं, तो सर्व प्रथम प्रभु राम को जानना होगा। प्रभु राम का प्राक्ट्य अपने भीतर करवाना होगा परन्तु हम अपनी संकीर्ण बुद्धि एवं लौकिक इन्द्रियों से त्रेता के इस युग-प्रणेता को नहीं जान सकते। वे केवल अयोध्या के ही आदर्श संचालक नहीं थे, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि के नियामक तत्त्व हैं। ऐसे ब्रह्मस्वरूप श्री राम जी को केवल ब्रह्मज्ञान के द्वारा ही जाना जा सकता है। श्री राम हमारे हृदय में निवास करते हैं और उनका दर्शन केवल दिव्य नेत्र द्वारा होता है। जिसके बारे में हमारे सभी धार्मिक शास्त्रों में बताया गया है। परंतु जब तक हमें एक पूर्ण सद्गुरु द्वारा ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति नहीं होती तब तक हम ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर सकते। सद्गुरु दीक्षा देते समय इस दिव्य नेत्र को खोल देते है। जिसके खुलते ही जिज्ञासु अपने भीतर ईश्वर के वास्तविक रूप का प्रत्यक्ष दर्शन करता है। जब भीतर हृदय के सिंहासन पर राम विराजमान होते है, तब राम राज्य की स्थापना होती है। स्वामी ब्रमेशानंद जी ने मंच का संचालन किया । स्वामी जी ने भक्तो को सम्बोधित करते हुवे कहा यह मानव देह ही अयोध्या है । इसमें जब राम का आगमन पूर्ण सतगुरु के द्वारा ही संभव हो सकता है तभी हम वास्तविक दीपावली माना सकते है । गुरु इस मानव घट में राम के प्रकाश का दर्शन कटवाते है तभी रामचरितमानस समझ मे आ सकता है । कथा का शुभारंभ मंत्रोउचरण से समापन मंगल आरती से किया गया।

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